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इंटरनेट पर राजस्थानी राज

इंटरनेट पर राजस्थानी राज
 

अजय कुमार सोनी
इंटरनेट पर राजस्थानी राजराजस्थानी भाषा को ख्याति दिलाने में इंटरनेट भी एक सशक्त जरिया बना है। नेट पर राजस्थानी को हर किसी ने चाहा तथा सम्मान दिया है। सरकारी वेबसाइटों पर भी अब राजस्थानी देखने को मिल रही हैं। श्रीगंगानगर जिला इस पहल की शुरुआत करने वाला पहला जिला है। इस जिले की सरकारी वेबसाईट पर राजस्थानी को सबसे पहले शामिल किया गया है। इंटरनेट पर राजस्थानी को अपनी पहचान दिलाने के लिए ब्लॉग सशक्त माध्यम बनकर उभरे हैं, इंटरनेट पर राजस्थानी भाषा और साहित्य के प्रचारक तथा साहित्यकार इन माध्यमों से निरंतर जुड़ रहे हैं।
राजस्थानी के ब्लॉग जो अभी तक सामने आएं हैं, उनमें राजस्थान की भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के साथ-साथ दूसरे विषयों की जानकारी भी देखने में आती हैं। इंटरनेट पर राजस्थानी कीजो वेब-पत्रिकाएं सामने आई हैं, वे इस प्रकार हैं- सत्यनारायण सोनी और विनोद स्वामी संपादित 'आपणी भाषा-आपणी बात'
 , राव गुमानसिंह राठौड़ का 'राजस्थानी ओळखांण', नरेन्द्र व्यास का 'आखर अलख' व 'आखर कलश', दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का 'जोग-लिखी', पतासी काकी का 'ठेठ देशी', नीरज दईया की मासिक वेब पत्रिका 'नेगचार', मायामृग का 'बोधि वृक्ष', राजस्थानी कविता कोश, जिसके संचालक प्रेमचंद गांधी हैं।
राजस्थानी के रचनाकारों के ब्लॉग में ओम पुरोहित 'कागद' का 'कागद हो तो हर कोई बांचै'
 
, रामस्वरूप किसान की राजस्थानी कहानियों का ब्लॉग
 
, संदीप मील का 'राजस्थानी हाईकू'
 
, 'बहती धारा'
 
, राव गुमानसिंह राठौड़ के 'राजिया रा दूहा'
 
, 'सुणतर संदेश'
 
, सत्यनारायण सोनी की राजस्थानी कहानियों का 'धान कथावां'
 
, शिवराज भारतीय का 'ओळूं'
 
, संग्राम सिंह राठौड़ का 'स्व. चंद्रसिंह बिरकाळी री रचनावां'
 
, डॉ. मदनगोपाल लढ़ा का 'मनवार'
 
, पूर्ण शर्मा 'पूरण' का 'मायड़ भाषा'
 
, जितेन्द्र कुमार सोनी (आई.ए.एस.) का 'मुळकती माटी'
 
, कवि अमृतवाणी का 'राजस्थानी कविता कोश'
 
, डॉ. नीरज दईया के 'सांवर दईया'
 
, 'राजस्थानी कवितावां'
 
, 'नेगचार'
 
, 'राजस्थानी ब्लॉगर'
 
'अनुसिरजण'
 
, डॉ. दुष्यंत का 'रेतराग'
 
, रवि पुरोहित का 'राजस्थली
 
', दीनदयाल शर्मा के 'टाबर टोळी'
 
, राजेन्द्र स्वर्णकार का 'शस्वरं
 
', अंकिता पुरोहित का 'कागदांश'
 
, किरण राजपुरोहित 'नितिला' का ''सिणगार'
 
, 'भोर की पहली किरण'
 
, संतोष पारीक का 'सांडवा', अजय परलीका का 'भटनेर'
 
व राजस्थानी गीतों का संग्रह 'बुगचो'
 
, दुलाराम सहारण के 'हरावळ'
 
, 'साहित्यकार दर्शन'
 
, 'आगीवांण'
 , 'हेलो' व 'पोथीखानो'
 
, नंद भारद्वाज का 'हथाई'
 
, पुखराज जांगिड़ का 'जय रामधनी'
 
, मोनिका शर्मा के 'तीज तैंवार'
 व 'मेरी परवाज'
 
, शिवराज गूजर के 'सिनेमा फेस्टिवल'
 
'मेरी डायरी'
 
, हरीश बी. शर्मा का 'मरूगंधा'
 , अलबेला खत्री का 'म्हारो प्यारो राजस्थान'
 
, उम्मेद गोठवाळ का 'अभिव्यक्ति'
 
, कुमार गणेश का 'रेजगार'
 
, चैनसिंह शेखावत का 'मायड़ रो गोथळियो'
 
, जोगेश्वर गर्ग का 'गूंगै रा गीत'
 
, सोहनलाल रांका का 'कवि सहज'
 
, डॉ. मदन सैनी, डॉ. मंगत बादल
 
, राजूराम बिजारणियां
 
, कविता किरण
 
, राजेश चड्ढ़ा
 
, सवाई सिंह शेखावत, संजय पुरोहित, सुनील गज्जाणी, हरीश भादाणी
 
, किशोर पारीक
 
, कृष्णा कुमारी
 
, चंद्र प्रकाश देवल
 
, निशांत
 
, पुरूषोत्तम यकीन
 
, बिहारी शरण पारीक
 
, मणि मधुकर
 
, मनोज कुमार स्वामी
 
, मालचंद तिवाड़ी
 
, रामेश्वर गोदारा 'ग्रामीण'
 
, लीटू कल्पनाकांत
 
आदि।
इंटरनेट पर राजस्थानी की मूल रचनाएं तथा अनूदित रचनाएं बहुत-सी पत्रिकाओं में निरंतर छपती रहती हैं। जिनमें- 'हिन्दी कविता कोश'
 
, नरेश व्यास का 'आखर कलश'
 
, प्रेमचंद गांधी का 'प्रेम का दरिया'
 
, रविशंकर श्रीवास्तव का 'रचनाकार'
 

राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के ब्लॉग भी हैं। जिनमें- कुंवर हनवंतसिंह राजपुरोहित के 'मरुवाणी'
 
'म्हारो मरुधर देश'
 
, विनोद सारस्वत का 'मायड़ रो हेलो'
 
, सागरचंद नाहर का 'राजस्थली'
 
, अजय कुमार सोनी के 'मायड़ रा लाल'
 
, 'राजस्थानी रांधण'
 
, राजस्थानी गीत गायक प्रकाश गांधी और जितेन्द्र कुमार सोनी के भी राजस्थानी ब्लॉग हैं।
राजस्थान के बारे में संपूर्ण जानकारियों को राजस्थानी भाषा में प्रस्तुत करने वाली प्रमुख वेब साईट- 'आपांणो राजस्थान'
 
है, जिसे इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सुरेन्द्र सिंह पोकरणा संचालित कर रहे हैं।
इंटरनेट पर कई गांवों के भी ब्लॉग हैं जो राजस्थानी में हैं- सत्य दीप का 'मेरो गाँव'
 
, रतन सिंह शेखावत का 'मेरा गांव भगतपुरा'
 
की माध्यम भाषा तो हिन्दी है, परन्तु राजस्थानी चित्र व ऑडिया-वीडियो भी हैं। अब तो अत्यंत खुशी की बात है कि जल्द ही ऑनलाइन राजस्थानी टेलिविजन और रेडियो खुलने वाले हैं। जिन पर राजस्थानी में ही प्रसारण किया जाएगा। जिसकी पहुंच प्रवासी राजस्थानियों तक भी होगी। ऑनलाइन राजस्थानी टेलिविजन बतौर प्रयोग शुरू कर दिया गया है, जिसमें अभी रोजाना राजस्थानी गीत लगाए जाते हैं। इसका नाम अभी 'मरुवाणी'
 
रखा गया है और इसके सूत्रधार कुंवर हनवंतसिंह राजपुरोहित हैं जो लंदन में अपना कारोबार करते हैं।

फेसबुक पर राजस्थानी

फेसबुक पर भी राजस्थानी को अत्यंत सम्मान मिला है। फेसबुक पर राजस्थानी का सूत्रपात करने के लिए वरिष्ठ साहित्यकार ओम पुरोहित 'कागद'
 
का नाम गर्व से लिया जाता है। पिछले छ: महीनों से फेसबुक पर राजस्थानियों की संख्या में इजाफा हो रहा है तथा संवाद की माध्यम भाषा राजस्थानी बनी है। फेसबुक पर मुख्यत: राजस्थानी के साहित्यकार डॉ. नीरज दईया
 
, डॉ. सत्यनारायण सोनी
 
, रामस्वरूप किसान
 
, माधोसिंह मूंड
 
, अंजली पारेख
 
, सिया चौधरी
 
, अंकिता पुरोहित
 
, अनिल जांदू
 
, हनवंतसिंह राजपुरोहित
 
, विनोद सारस्वत
 
, भाषाविद् लखन गौसाईं
 
आदि। फेसबुक पर राजस्थान के निर्वाचित सांसद और विधायक भी राजस्थानी के लिए जुड़े हुए हैं, जिनमें बीकानेर सांसद अर्जुनराम मेघवाळ
 
, पूर्व राज्यमंत्री जोगेश्वर गर्ग
 
, नागौर सांसद ज्योति मिर्धा आदि।

पाकिस्तान में राजस्थानी

इंटरनेट के माध्यम से दुनियाभर के लोग पाकिस्तान में पसरी राजस्थानी संस्कृति से निरंतर परिचित हो रहे हैं। फेसबुक पर कई ऐसे वीडियो शेयर किए गए हैं जिनमें पाकिस्तान के कई राजनेता जनसभाओं को वहां के एक बड़े भू-भाग की जनभाषा राजस्थानी में संबोधित करते हुए देखे-सुने जाते हैं।
 
पाकिस्तान में राजस्थानी लोकसंगीत की भी धूम है, जिनके वीडियो भी बड़ी तादाद में शेयर किए गए हैं।
केन्द्र सरकार की उदासीनता के चलते राजस्थानी की मान्यता का सवाल अधरझूल में पड़ा है। इन उपलब्धियों को देखते हुए केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह राजस्थानी भाषा को तत्काल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करे।


Regards
Ajay Kumar Soni
VPO- Parlika, Teh- Nohar, Dist- Hanumangarh
(Rajasthan) PIN- ३३५५०४
E-Mail- ajay@parlika.com
Mobile- 96024-12124

वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओम पुरोहित 'कागद' जी रो राजस्थान रै सांसदा नै कागद


घणां मानीता अनै आदरजोग सांसद सा ,

                 जय राजस्थानी-जय राजस्थान !
 

               आप उण रजस्थान रा घणां हेताळू अनै म्होबी सांसद हो जिण री मायाड़ भाषा राजस्थानी है ! आप ओ भी जाणो हो कै राजस्थान रो नांव ई राजस्थानी भाषा रै ताण थरपीज्यो हो ! आज आज़ादी रै ६३ सालां बाद भी १३ करोड़ राजस्थानी आपरी मायड़ भाशा राजस्थानी री राजमानाता सारू बिलखै ! आपां दुनियां री लूंठी भाषा रा मालक होंवता थकां ईं ग्राम पंचायत सूं लेय’र संसद तांई में आपरी मायड़ भाषा राजस्थानी में नी बोल सकां ! आज़ादी सूं लेय’र हाल तांईं अबोला हां ! आपणी जुबान माथै ताळो है ! संसद में बोलण री दरकार है कै " सगळी भाषावां नै मानता-म्हानै टाळो क्यूं-म्हारी जुबान पर ताळो क्यूं  ?"आप सूं आस है कै आप संसद रै शीतकालीन सत्र में आ बात जोरदार ढंग सूं उठास्यो अनै राजस्थानी भाषा नै संविधान री आठवीं अनुसूची में भेळण री मांग मनवास्यो !             
               आपणी मायड भाषा राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में भेळण सारू  राजस्थान में चाल रैयै आंदोलन सूं आप आच्छी तरियां परिचित हो ! आप राजस्थान में इण पैटै जगरुकता रा पड़तख गवाह भी हो !राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में नीं भेळण सूं होवण आळा घाटा भी आप सूं छाना नीं है ! आज आखो राजस्थान आपणी मायड भाषा राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में नीं भेळण रै दुख सूं कितरो दुखी है-आ बात भी आप सूं छानी नीं है ! पूरै देश रा टाबर आपरी मायड भाषा में शिक्षा ले रैया है पण राजस्थान रा टाबर कित्ता निरभागी है कै दुनियां री ऐक लूंठी भाषा रा मालक होंवता थकां परभाषा में प्राथमिक शिक्षा लेवण नै मज़बूर है ! अब "नि:शुल्क एवम अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम" रै आयां तो ओ और भी लाजमी होग्यो कै राजस्थान रा टाबर भी आपरी मायड़ भाषा राजस्थानी में प्राथमिक शिक्षा लेवै ! पण लेवै तो कीयां लेवै ? हाल आपणी मायड़ भाषा राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में नीं भेळीजी है ! आप तो जाणो ई हो कै इण बिना आ बिद नीं बैठै सा !
                 आप राजस्थान रा अर राजस्थानी भाषा रा म्होबी बेटा हो ! आप सूं आपरी मायड़ भाषा राजस्थानी आस राखै कै आप उण री आन-बान-स्यान सारू खेचळ जरूर करस्यो । आपरै छेतर  रा लोग भी आस राखै कै आप उणां नै उणां री ज़ुबान दिरावस्यो ! आप नै ध्यान ई है कै राजस्थान विधान सभा सूं मानजोग अशोक जी गहलोत सा राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में भेळण रो प्रस्ताव सर्वसम्मति सूं पारित कर लोकसभा में पारित करण सारू केन्द्र सरकार नै भेजियो हो । बो प्रस्ताव बठै लारला सात बरस सूं रुळै है !
आप सूं अरज़ है कै आप मानजोग प्रधानमंत्री जी अर गुहमंत्री जी सूं मिल परा बेगै सूं बेगो राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में भेळण सारू संविधान संषोधन विधेयक ल्यावण री ताकीद करो सा !
राजस्थानी नै संविधान री आठवीं अनुसूची में भेळीज्यां आपरो जस सवायो अनै ऊजळो होसी सा !

आपरो इज हेताळु

ओम पुरोहित"कागद"
२४-दुर्गा कोलोनी
हनुमानगढ़ संगम-३३५५१२
मोबाइल-०९४१४३८०५७१
 
Email:omkagad@gmail.com
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राजस्थानी को सोवियत रूस ने समझा, हमने नहीं

Bhaskar News
First Published 02:15[IST](15/04/2010)
Last Updated 02:15[IST](15/04/2010)
जयपुर. राजस्थानी भाषा के गौरव और समृद्धि की अहमियत को सोवियत रूस जैसे बड़े देश तक ने समझा लेकिन हम नहीं समझ पाए। तत्कालीन सोवियत रूस के लेखक बोरिस आई क्लूयेव सहित कई विद्वानों ने 70 के दशक में राजस्थानी भाषा पर शोध कर इसके समग्र स्वरूप को मान्यता देने की वकालत की थी।
बोरिस ने राजस्थानी की विभिन्न बोलियों पर अपने शोध में कहा था कि राजस्थान में भाषा स्थिति इतनी जटिल नहीं है जितनी पहली बार में दिखाई देती है। इसके अलावा राजस्थानी भाषा की आंचलिक बोलियों के आधार पर राजस्थानी के स्वरूप को बिगाड़ने और इसमें विभेद पैदा करने की कोशिशों को भी गलत बताया है।

क्लूयेव ने स्वतंत्र भारत

जातीय तथा भाषाई समस्या विषय पर शोध शुरू किया तो राजस्थानी ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। उन्होंने राजस्थान में संजाति—भाषायी प्रक्रियाएं शोध में साफ लिखा, राजस्थानी की विभिन्न बोलियों में से ज्यादातर एक ही बोली समूह की हैं। इन बोलियों की पुरानी साहित्यिक परंपराएं हैं। प्राचीन मरू भाषा से डिंगल के साहित्य और से अब तक राजस्थानी ने साहित्यिक भाषा के प्रमुख पड़ाव तय किए हैं।
1961 की भाषाई जनगणना के अनुसार राजस्थानी को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या 1.50 करोड़ थी। राजस्थानी बोलने वालों की राजस्थान के बाहर भी अच्छी खासी तादाद है। संख्या के हिसाब से राजस्थानी देश की 12वीं प्रमुख भाषा है और 1961 की जनगणना में भाषाई गणना के हिसाब से भारत की प्रमुख भाषाओं के कम में इसे 12वें पायदान पर रखा गया। इसमें राजस्थान में रहने वाले 80 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा राजस्थानी बताई गई है।

रूसी शोध में भी प्रमुख था मान्यता का मुद्दा


राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का जिक्र रूसी विद्वान के शोध में भी था। राजस्थानी को 60 के दशक से राजभाषा की मान्यता देने की मांग उठाई जा रही है।

करणीसिंह ने लोकसभा में रखा था विधेयक


बीकानेर सांसद और पूर्व राजा करणीसिंह ने 1980 में राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक विधेयक लोकसभा में विचारार्थ रखा था। उस समय इस विधेयक पर बहस हुई और लोकसभा में यह 92 के विरुद्ध 38 मतों से गिर गया। तब से लेकर राजस्थानी को मान्यता का मुद्दा अभी अनिर्णीत ही है।

राजस्थानी ने लुभाया इन रूसी विद्वानों को

एल.वी. खोखोव : राजस्थान में प्रयुक्त हिंदी और राजस्थानी भाषाएं- सामाजिक तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का अनुभव (शोध प्रबंध 1974, मास्को)।
लुई एसेले : भारत के चित्र 1977 (मास्को)

जनपद री बोल्यां है मिणियां, माळा राजस्थानी।

समाचार सन्दर्भ- राजस्थानी को बचाना जरूरी
(समाचार पढऩे के लिए क्लिक करें।)

जनपद री बोल्यां है मिणियां,

माळा राजस्थानी।

-सत्यनारायण सोनी, प्राध्यापक-हिन्दी
मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों ने अपने बयानों में राजस्थानी को बचाना जरूरी माना है और दबी जुबान में कुछ शंकाएं भी प्रकट की हैं, जो कि पूर्णतया बेमानी और आधारहीन हैं। यह उनकी भाषाई समझ के दिवालिएपन का द्योतक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी को चिंता है कि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि राजस्थानी भाषा किसे कहा जाए, क्योंकि हर क्षेत्र में अलग-अलग बोलियां हैं। हम राजस्व मंत्री महोदय को याद दिलवाना चाहते हैं कि बोलियां किसी भी भाषा की समृद्धता की सूचक होती हैं। दुनिया के समस्त भाषाविद यह मानते हैं कि जिस भाषा में जितनी अधिक बोलियां होंगी वह उतनी ही समृद्ध होगी। बिना अंगों के शरीर की तरह से होती है बिन बोलियों के भाषा। भाषा अंगी और बोलियां अंग होती हैं। हिन्दी की अवधी, बघेली, छतीसगढ़ी, ब्रज, बांगरू, खड़ी, कन्नौजी, मैथिली आदि बोलियां ही तो हैं। हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में अवधी के तुलसी, ब्रज के रसखान और सूर, मैथिली के विद्यापति, सधुक्कड़ी के कबीर आदि गर्व के साथ पढ़ाए जाते हैं। भाषाई विभिन्नता के बावजूद भी प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी और फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी के आधुनिक गद्य लेखकों के रूप में प्रसिद्ध हैं। पंजाबी की पोवाधि, भटियाणी, रेचना, सेरायकी, मांझी, दोआबी, अमृतसरी, जलंधरी आदि कितनी ही बोलियां हैं और वह विश्वभर में सम्मानित है। इसी भांति राजस्थानी की मेवाती, मेवाड़ी, हाड़ोती, ढूंढाड़ी, मारवाड़ी, मालवी आदि बोलियों के बावजूद लेखन के स्तर पर एक ही भाषाई रूप प्रचलित है। अंचल विशेष के प्रभाव से कहीं-कहीं विविधता नजर आती है तो वह कमजोरी नहीं भाषा की, खासियत है। साहित्य के लिए यही अनिवार्य शर्त होती है कि उसमें हर स्तर पर लेखक का परिवेश बोलना चाहिए। हम माननीय हेमारामजी से निवेदन करना चाहते हैं कि राजस्थानी भाषा में प्रकाशित होने वाली दर्जन-भर पत्र-पत्रिकाएं अपने घर पर मंगवाएं। ग्यारहवीं से लेकर एम.. तक की पढ़ाई में शामिल राजस्थानी साहित्य की पाठ्यपुस्तकें पढ़कर देखें। बाजार में उपलब्ध राजस्थानी लोकगीतों के केसेट्स ऑडियों-वीडियो सीडी घर पर लाकर कभी फुरसत में सुना करें। और फिर अपना वही सवाल दोहराएं। राजस्थानी के अनुभवी और विद्वान लेखकों ने पाठ्यपुस्तकें ऐसी तैयार की हैं कि उनमें हर विद्यार्थी को अपनेपन की महक आती है। सिंहासन पर बैठकर आदमी अपनी जमीन से कट जाता है और किसी विषय में अल्पज्ञानी होते हुए भी बड़ी-बड़ी डींगें हांकने लगता है।
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री भरतसिंह की कमोबेश यही चिंता है जिसका जवाब ऊपर की पंक्तियों में चुका है, मगर उनके इस बयान से हमें घोर आपत्ति है कि हिन्दी और अंग्रेजी ऐसी भाषाएं हैं जिसे हर क्षेत्र का व्यक्ति सहजता से समझ सकता है। माननीय भरतसिंह जी, आप अपने निर्वाचन क्षेत्र में इन्हीं भाषाओं में वोट क्यों नहीं मांगते? क्योंकि आपकी वोटर-जनता तो इन्हें सहजता से समझती है। घर के शादी-समारोहों, व्रत-त्योहारों और उत्सवों पर भी इन्हीं भाषाओं के गीत गाए जाते होंगे आपके यहां? हाड़ोती के लोग अगर हिन्दी और अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं तो घर-परिवार में नहीं। जहां जरूरत हो इनकी वहां किया भी जाना चाहिए। राजस्थानी का सम्मान करने का मतलब किसी अन्य भाषा की अवहेलना नहीं होता, सबसे पहले तो आपको यह समझ लेना चाहिए। हाड़ोती अंचल के बहुत-से आयोजनों में जाने का मौका मिला है। ठेठ हाड़ोती में बातचीत करते हुए देखता रहा हूं और मंचों से बोलते हुए भी सुना है मैंने लोगों को। बहुत-से लेखक मित्रों यथा- अतुल कनक, प्रहलाद सिंह राठौड़, डॉ. शांति भारद्वाज राकेश, गिरधारी लाल मालव आदि से फोन पर बातचीत भी ठेठ राजस्थानी भाषा और बाकायदा उनके हाड़ोती लहजे में होती है। माननीय भरतसिंहजी, हम जानते हैं और इसलिए आपकी प्रशंसा सुन चुके हैं कि आप जनसभाओं को ठेठ हाड़ोती में सम्बोधित करते हैं, फिर आज आपने यह बयान दिया है तो हमें बड़ा अचरज हो रहा है।
पूर्व शिक्षामंत्री कालीचरण सराफ को चिंता है कि राजस्थानी लागू होने से वैश्विकरण के दौर में हम पीछे रह जाएंगे। तो सवाल यह उठता है कि भारत के लगभग हर प्रांत में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती है और राजस्थान में नहीं। बताइए वे प्रान्त कितने' पीछे रह गए और राजस्थान के बच्चों से उनकी मातृभाषा छीनकर आपने कितना' आगे निकाल दिया? गांधीजी ने अपने अनुभवों के आधार पर जो लेख लिखे उनमें स्पष्ट किया कि जितनी अंग्रेजी और फारसी बालक अन्य माध्यम से चार साल में सीखता है वही अपनी मातृभाषा के माध्यम से एक बरस में सीख सकता है। वैश्विकरण के दौर में आप बच्चों को अगर अंग्रेजी सिखाना चाहते हैं तो वह मातृभाषा के माध्यम से ही सिखाइए और उसकी सीखने की गति तो देखिए। दुनियाभर के शिक्षाविद कोई अंधेरे में तीर नहीं मार रहे। अपने अनुभवों का निचोड़ पेश किया है उन्होंने। गांधीजी की बात पर गौर फरमाएं- 'मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियां क्यों हो, मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूंगा, जिस तरह मां की छाती से। वही मुझे जीवन प्रदान करने वाला दूध दे सकती है।'
और अंत में कवि कन्हैयालाल सेठिया की ये पंक्तियां आप सब के लिए-
मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, वागड़ी,
हाड़ोती, मरुवाणी।
सगळां स्यूं रळ बणी जकी बा
भाषा राजस्थानी।
रवै भरतपुर, अलवर अळघा
आ सोचो क्यां ताणी!
हिन्दी री मां, सखी बिरज री
भाषा राजस्थानी।
जनपद री बोल्यां है मिणियां,
माळा राजस्थानी।

कानांबाती : 09602412124

राजस्थांन दिवस

राजस्थांन दिवस मनावण री मन मांय उमक जागी, अेक’र पाछौ टटोळ्यौ जकौ पोसाळां मांय बांच्यौ हौ. राजस्थांन कंया बण्यौ अर इणरौ इतिहास कांई हौ.


सब देख’र लागौ कै फक्त इणरौ नांव इज राजस्थान पड़‌यौ छै, राजस्थान मांय रेवणीयौ राजस्थानी कुहावै पण वौ ई फक्त नांव रौ राजस्थांनी, उणनै उणरी भासा अर संस्क्रती सूं हेत राखण रौ हक ईं नीं दियौ भारत सरकार.

सरदार पटेल राजपुतानै रै सगळा राजावां नै लाळा-लुंभा करनै अर वांनै वांरी अर वांरै रईयत (प्रजा) री भलाई बताय’र भारत मांय विलय वास्तै राजी कर दिया. इणरै साथै ईं अठा री संस्क्रती, अठा री सभ्यता, रीति रिवाज सैं कीं खतम कर दियौ. भारत मांय विलय रै साथै ईं आपां आपणी हजारूं बरसां री परंपरा, भासा अर संस्क्रती रौ राष्ट्रीय अेकता अर अखंडता रै नांव पर आपां समर्पण कर दियौ.

राजस्थांनी भारत मांय सबसूं विशाळ भाग मांय बोली जावण वाळी भासा छै. आ भासा आखै राजस्थांन, मध्य प्रदेश रै माळवै, उत्तर गुजरात, पाकिस्तान रै सिंध, थारपारकर अर पंजाब रा घणकरा इलाकां, हरियाणा अर इणरी अेक बोली गुजरी तौ कश्मिर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चेकोस्लाविया अर सोवियत रुस रा घणकरा देसां मांय बोलीजे.

भारत सरकार राजपुतानै नै राजस्थांन नांव तौ दे दियौ, पण राजस्थांन रा प्राण अठा री भासा नै मानता नीं दी. राजस्थांन री सगळी बोलियां सूं मिळ’र जै भासा बणै वा अेक राजस्थांनी नै इण री बोलीयां रै हिसाब सूं तोड दी अर इणनै हिंदी भासा री अेक बोली बताय दि.

भारत सरकार नै औ डर ई सतावै कै जिण हिंदी भासा नै राष्ट्रभासा बणावण रौ वा सुपणां देखै छै, अर बोलै छै कै आ भासा दुनीया री तीजी सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै. राजस्थानी भासा नै मान्यता मिळ जावै तौ इण भारत सरकार री आ बात झुठी हु जावै, क्युं कै राजस्थांनी अेक स्वतंत्र भासा रै रुप मांय भारत री सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै.

राजस्थान रै भारत मांय विलय सूं राजस्थांन नै अेक हिसाब सूं गुलामी इज हाथ लागी है. भारत मांय रेवता राजस्थांनीयां नै आपरी भासा वापरवा रौ इधकार कोनीं, जिणसूं वांनै वांरै राज्य मांय भासा रै आधार पर मिलण वाळा सगळा हकां सूं हाथ धोवणा पडे छै. राजथांनीयां नै वांरै खुद रै राज्य मांय नौकरी नीं मिळै. दूजा राज्यां रा हिंदी भासी आय’र अठै नौकरी करै अर आपणा राजस्थांनी भाई प्रदेसा कांनी न्हावै.

दूजी कांनी पोसाळां मांय शिक्षा हिंदी भासा मांय हुवण सूं टाबरां नै भणाई मांय तकलिफ आवै. टाबर डाफाचुक व्है जावै कै, घरै तौ वौ दूजी भासा बोलै अर पोसाळां मांय दूजी भासा छै. वौ खुद री भासा नै हिनता री निजर सूं देखण लागै. अेड़ौ टाबर ना तौ हिंदी बराबर सिखै ना ई राजस्थांनी रौ ग्यान हुवै. सेवट ૪-૫ पास करनै वौ पोसाळां (स्कुलां) छोड’र प्रदेशां कांनी मुंडो करै.

राजस्थांन रै भारत मांय विलय सूं अठा रै मानखां नै बेरोजगारी मिळी, लोगां नै आपणी भासा-संस्क्रती रै प्रती हिन भावना मिळी. पछै बतावौ कैड़ौ राजस्थांन दिवस. हकिकत मांय तौ ૩૦ मार्च नै राजस्थांन वासियां नै काळा दिन रै रुप मांय मनावणौ चाईजै. लोग केह्‌वै इण दिन राजपुतानै री सगळी रियासतां आपस रौ बैर भुलाय’र अेक हूगी, ना आ बात नीं है, राजस्थान सूं पैली जद राजपुतानौ हौ उण समै अेकता अबार रै राजस्थान करता वधारै ही, हर रियासत री राजभासा राजस्थानी ही. लोगां रै कन्नै रुजगार हौ अर आपसरी मांय घणौ भाईपौ हौ.

रहसी राजस्थान, राजस्थानी राखिया ।
हनवंतसिंघ

राजस्थानी राखियां,रहसी राजस्थान

राजस्थानी राखियां,

रहसी राजस्थान


-मनोज कुमार स्वामी, सूरतगढ़
भेदभाव तो सदियां सूं चालतो आयो। पण राजस्थानी भाषा साथै कीं बेसी। राजस्थान रा रैवासी आपरी भाषा री मानता री लड़ाई लड़ै, पण गांधीवादी ढंग सूं। कुरसी बिराज्या नेता बां री अरज सुणै कोनी। वोटां वगत तो लुळ-लुळ हाथ जोड़ै। पगां पड़ै। इलाकै रै विकास री बातां करै। पण चुणाव जीततां पाण गधै रै सींगां ज्यूं अदीठ व्है जावै। चुणाव री वगत मीठी गोळी देवै। पण पछै भाषा अर भाषा रा हेताळुवां नै भूल जावै। दीनाजपुर (बंगाल) मांय सन् 1944 मांय अखिल भारतीय राजस्थानी सम्मेलन नांव सूं बडो जलसो हुयो। तद सूं लेय' अजे तक आंदोलन लगोलग चाल रैयो है। पण अजे पार कोनी पड़ी। दुनिया रो कोई इस्यो देस कोनी जठै रै लोगां नै आपरी भाषा सारू इत्तो लाम्बो आंदोलन चलावणो पड़्यो हुवै। कोई इसी भाषा कोनी दुनिया में जिकी री इत्ती बेकदरी होयी हुवै। मां सूं आछो कीं नीं हुवै जगत में। भाषा तो आपणी मां है। मायड़भाषा रो मान करणो भूल बैठ्या अठै रा वासी। पण फेर लखदाद है बां हेताळुवां नै जका लगोलग मायड़भाषा नै मान दिरावण री लड़ाई लड़ै। लड़ता थकै कोनी। मायड़भाषा सनमान जातरा जकी श्रीगंगानगर सूं 21 फरवरी, 2003 नै सरू हुय' राजस्थान रा उगणीस जिलां नै पार करती 4 मार्च, 2003 नै दिल्ली पूगी। भाषा नै लेय' एक अनूठी जातरा ही। इसी मिसाल और कठै नीं मिलै।
संविधान री आठवीं अनुसूची में सामल होवण रा सगळा मापदण्ड राजस्थानी भाषा पूरा करै। पण नेतावां नै दीसै कोनी। लाखूं ग्रंथ ग्रंथागारां में हाथां लिख्योडा पड़्या है। जे ना जचै तो जाय' आपरी आंख्यां सूं पड़तख देखल्यो। पण देखल्यै कुण? तो जाण-बूझ' कानां में कोइया लेवै। जींवतां नै तळै नाखै। दिल्ली जाय' ओळमो देवो तो खाणै ऊंठ ज्यूं सीधा आवै। धिरकार है मायड़ रै इस्यै कपूतां नै, जका आपरी मां-भाषा रो मान नीं करै। नेतावां री अणदेखी रै बावजूद राजस्थानी आपरो रुतबो कायम राख्यो है। आठवीं अनुसूची मांय भेळी हुयां बिना केन्द्रीय साहित्य अकादेमी सूं मान्यता है। बोर्ड, विश्वविद्यालयां अर यू.जी.सी. रै पाठ्यक्रमां मांय सामिल है। मतलब 11 वीं सूं लेय' एम.. तांईं री पढ़ाई राजस्थानी विषय लेय' करी जा सकै। यू.जी.सी. रै नेट में राजस्थानी है। टी.वी. अर रेडियो पर राजस्थानी समाचारां रा बुलेटिन आवै। राजस्थानी कलाकारां री दुनियां में न्यारी पिछाण है। सैकड़ूं पत्र-पत्रिकावां छपै। राज्य री राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी है। भाषा जण-जण रै काळजै रची-बसी है। तो पछै कांईं कमी है? कमी है तो बस आठवीं अनुसूची में सामल होवणै री। म्हारो नेतावां सूं सवाल है कै जे आप राजस्थानी री मानता री बात नीं करो अर राजस्थानी नै भाषा नीं मानो तो पछै राजस्थानी रै नांव पर ऊपर लिखी बातां क्यूं? सवाल भी काळजै में बार-बार हूक-सी उठावै कै जद 22 भाषावां नै राज मानता तो पछै राजस्थानी साथै दुभांत क्यूं? अमरीका सरकार जिकी भाषा नै सनमान बगसै बीं नै भारत सरकार क्यूं कोनी मानै? जालोर रा लालदासजी राकेश लिखै-

ओ जीवण तो जावसी, दे माथो रख मान।
राजस्थानी राखियां, रहसी राजस्थान।।
आजादी आई अठै, ताळा जड़्या जुबान।
राजस्थानी राखियां, रहसी राजस्थान।।